"भारत एक महान देश है" यह सिर्फ एक सुवाक्य मात्र नहीं है यह है वो जज्बात जो प्रत्येक भारतवासी के दिल में पाया जाता है भारत को महान सिर्फ भावनात्मक हो कर नहीं बताया या कहा जाता है बल्कि इस कथन के समर्थन में कई सरे तथ्य प्रस्तुत किये जा सकते है और यह पुर्णतः हमारे शीर्षक से अलग की विषयवस्तु है जिसपर हम फिर कभी चर्चा करेंगे अभी हम वर्तमान शीर्षक पर लौटते हैं--
भारत वर्ष की पूर्ण जिम्मेदारी यहाँ के नागरिको की है, पर सरकार यहाँ के नागरिक नहीं चलातेपरोक्ष रूप पे सत्ता जनता के नुमायिन्दोंके हाथों में है जो खुद को जनता के प्रतिनिधि बताया करते हैंपरन्तु जनताखुद इनके बर्ताव से आश्चर्यचकित होती है की क्या सच में ये वही लोग है जिसको उसने चुना था, अपनी बेहतरी के लिए , सुशासन के किये, अपने देश की विकास करने के लिए !!!
वास्तव में देश की गर्त में पहुचने के लिए नेता जिम्मेदार है देश की जनता क्योंकि जनता चाहे लाख ना नुकुर कर ले पर वास्तविकता तो यही है की उसी ने उन नेताओं को वो पदवी दी है जिस पर बैठ कर वो मनमाने तौर पर कार्य कर रहे हैं पर देश के नागरिको को कैसे दोष दिया जाये कही पर भी इतनी बड़ी आबादी गलत नहीं हो सकती यह बिलकुल भी विश्वास के लायक बात नहीं है के भारत के सरे लोग मतिहीन हैं तभी तो ये नालायक लोग उतने महत्वपूर्ण पदों पर बैठें हैं पर इस बात से कतई मुंह नहीं मोड़ा जा सकता की, "वास्तविकता तो यही है" तो आखिर गलती कहाँ पर हुई? सारी जनता भी गलत नहीं है तो ये कैसे पहुँच गये उस स्थान तक?
भारत वर्ष की पूर्ण जिम्मेदारी यहाँ के नागरिको की है, पर सरकार यहाँ के नागरिक नहीं चलातेपरोक्ष रूप पे सत्ता जनता के नुमायिन्दोंके हाथों में है जो खुद को जनता के प्रतिनिधि बताया करते हैंपरन्तु जनताखुद इनके बर्ताव से आश्चर्यचकित होती है की क्या सच में ये वही लोग है जिसको उसने चुना था, अपनी बेहतरी के लिए , सुशासन के किये, अपने देश की विकास करने के लिए !!!
वास्तव में देश की गर्त में पहुचने के लिए नेता जिम्मेदार है देश की जनता क्योंकि जनता चाहे लाख ना नुकुर कर ले पर वास्तविकता तो यही है की उसी ने उन नेताओं को वो पदवी दी है जिस पर बैठ कर वो मनमाने तौर पर कार्य कर रहे हैं पर देश के नागरिको को कैसे दोष दिया जाये कही पर भी इतनी बड़ी आबादी गलत नहीं हो सकती यह बिलकुल भी विश्वास के लायक बात नहीं है के भारत के सरे लोग मतिहीन हैं तभी तो ये नालायक लोग उतने महत्वपूर्ण पदों पर बैठें हैं पर इस बात से कतई मुंह नहीं मोड़ा जा सकता की, "वास्तविकता तो यही है" तो आखिर गलती कहाँ पर हुई? सारी जनता भी गलत नहीं है तो ये कैसे पहुँच गये उस स्थान तक?
मेरा मानना है के दोष सरकार और जनता के बिच की कड़ी का है और वो कड़ी है " भारत का चुनाव आयोग" देश की २/३ जनसँख्या साक्षर है अगर हम इनमे से सभी को शिक्षित ना भी समझे तो भी इनमे से आधे लोग सही गलत का समझ रखते ही होंगे, यह तो मान सकते हैं अगर ३५ % जनसँख्या भी विवेकानुसार वोट डालती है तो हमेशा एक बेहतर उम्मीदवार जनता का प्रतिनिधि बनेगा आज स्थिति यह है कीअगर किसी स्थान पर ५५-६०% भी मतदान हुआ तो उसे बहुत अच्छा माना जाता है आखिर यह मानसिकता क्यों है आयोग की? ऐसा लगता है की जो ४०-४५% लोग मतदान में भाग नहीं लिए वो समझदार तो नहीं पर सही गलत क विवेक जरूर रखते होंगे
मेरा उपरोक्त कथन एक विवाद का विषय हो सकता है पर अगर हम सूक्ष्म दृष्टि से देखे तो ये तथाकथित समझदार लोग ही है जो एक सही नेतृत्व प्रदान कर सकते हैं या कम से कम एक सही नेता तो चुन ही सकते हैं पर वो ऐसा नहीं करते वो निश्चित तौर पर गलत करते हैं परइसके लिए वो जो कारन देते हैं वो भी गलत नहीं लगता मुख्य रूप में ये कारन होते हैं---
मेरा उपरोक्त कथन एक विवाद का विषय हो सकता है पर अगर हम सूक्ष्म दृष्टि से देखे तो ये तथाकथित समझदार लोग ही है जो एक सही नेतृत्व प्रदान कर सकते हैं या कम से कम एक सही नेता तो चुन ही सकते हैं पर वो ऐसा नहीं करते वो निश्चित तौर पर गलत करते हैं परइसके लिए वो जो कारन देते हैं वो भी गलत नहीं लगता मुख्य रूप में ये कारन होते हैं---
मतदान के लिए लगने वाली कतार : चुनाव आयोग अगर चाहे तो चुनाव के लिए और ज्यादा समय दे सकता है या चुनाव कर्मी घर घर जाकर मतपत्र पेटी (Ballot box ) में मतदान करवा सकते थे हो सकता है की यह काफी असुविधाजनक और महंगा होता पर एक बुरे नेता की तुलना में यह अच्छा ही होता हम ऐसा भी कर सकते है की मतदान अनिवार्य कर दें और पहले अवस्था में शिविर में मतदान कराये और जो शिविर में ना आ पायें उनके लिए मतदान कर्मी घर जा कर मतदान करवाएं पर घर पर मतदान करवाने वालों की भीड़ को कम करने के लिए चाहे तो कुछ जुरमाना भी लगा सकते हैं।
सही उम्मीदवार का होना: ऐसा बहुत बार देखा गया है की जनता में मतदान के प्रति अनिच्छा सही उम्मीदवार का मैदान में ना होना भी होता है इसके निवारण हेतु मतपत्र पेटी एक बटन सभी उम्मीदवारों को अस्वीकार करदेने का भी होना चाहिए और अगर चाहें तो दूसरा बटन राष्ट्रपति शासन या डीएम /मतदान मतदानशासन स्वीकार करने का भीक्योंकि यह पाया गया है की देश की जनता में राजनीतिज्ञों की ख़राब छवि की वजह से राष्ट्रपतिशासन के प्रति लगाव की भावना आ जाती है
मतदान कर्मियों के मतदान को और आसन बनाना: चुनाव आयोग अगर चाहे तो यह सर्वेक्षण करवा कर ज्ञात कर सकती है कि कितने प्रतिशत सरकारी कर्मचारी मत दे पाते हैं वो अपने चुनाव में कार्यरत होने कीवजह से अपने वोते का इस्तेमाल नहीं कर पाते
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