मंगलवार, 5 अक्टूबर 2010

भारत सरकार और खेल

कहते हैं किजब युद्ध नहीं हो रहा होता है तो किसी देश के की क्षमता का आकलन खेलों में उसके प्रदर्शन से किया जाता है पर मेरे निजी विचार में ऐसा पूरी तरह से अनुचित है कि देश कि आधी आबादी भुखमरी के स्तर पर हो और हम अपना ध्यान खेलों पर लगाये और उत्साह बढ़ाये अपने खिलाडियों का कि भई जीत लो मेडल!! दुसरे देशों के खिलाडियों से आगे निकल जाओ ताकि वो जो विकसित देश हैं उनका मानमर्दन किया जा सके और जो समकक्ष है उनमे हमारा रुतबा बढ़ सके कि देखो दुनियांवालो हमारे यहाँ आधी आबादी कुपोषित है फिर भी हमने इतने पदक हासिल किया है

पर आप तो बड़े गर्व के साथ भारत का नया चेहरा दुनिया को दिखलाओगे पर जो देशवासी हैं उनको अपना चेहरा कैसे दिखायेंगे जब वो पूछेंगे कि हमारे भूख की कीमत पर आपने प्रत्येक खिलाडी को करोडों बाटें हैं तो क्या जवाब होगा हमारा? पब्लिक के पैसे पर जाने कितने तथाकथिक खिलाडी और (तेज़-तर्रार) ऑफिसर विदेश भ्रमण कर आते हैं और अंत में हमारे पास मेडल कितना होता है? बमुश्किल से दो या एक यह स्थिति है भारत में खेल की विश्व का सबसे बड़ा खेल आयोजन ओलंपिक में बहुत से ऐसे खेल शामिल हैं जो भारत के किये पारम्परिक हैं गाँव के बच्चे बच्चे इन खेलो में निपुण होते हैं और कितने तो शुरुवात में हीं "अंतर्राष्ट्रीय स्तर" के बराबर होंगे पर वो कैसे खेल पटल पर उभरेंगे, अगर उनका पेट महीने में १० दिन खाली रहता हो तो? बचपन में उन्होंने हाथ में गिल्ली-डंडा पकड़ने से पहले कुदाल और फावड़े पकड़ा हो तो खेलो में वो कैसे आयेंगे? वो निशाना लगते हैं चिड़ियों को मारने के लिए, जानवरों के साथ दौड़ लगाते हैं, उन्हें पकड़ने के लिए; तैरना सिखाते हैं, हर साल आने वाले बाढ़ से बचने के लिए वो घास पातहीं खाकर मजबूत हैं, उनमे तेज़ी है स्फूर्ति है किस काम के लिए? मात्र एक हीं उत्तर है इस यक्ष प्रश्न का--- ताकि वो जी सके और उम्रपर्यंत सरकार का और उसके नुमायिन्दों की सेवा कर सके जो मेरी इस बात से असहमत हों उन्हें मैं मात्र यही मशवरा देना चाहूँगा की जाओ और किसी चौराहे पर देखे उन छोटे बच्चो को जो तरह तरह के करतब दिखा कर 1-2 रुपये के लिए हाथ फैलाते हैं क्या इन बच्चो में उन्हें आपना गोल्ड मेडल नज़र नहीं आता? क्या ये अच्छे जिम्नास्टिक नहीं बन सकते हैं हम उन्हें भीख नहीं देंगे क्यों की सरकार ने प्रतिबंधित किया है या वो काम कर के नहीं कमाते या फिर वो नशा करते है इत्यादि



हम किसी खिलाडी के पदक जितने पर मालामाल बना देते हैं मैं ये बिलकुल भी नहीं कहता कि यह गलत है पर जरा सोचिये उन पैसे में 10 खिलाडी तैयार किये जा सकते हैं कि अपने जीवन में 10-10 स्वर्ण पदक जीत कर दे सकते है ऊपर से एक संतुस्ती यह भी कि आपने 10 लोगों का जीवन सुधार दिया यह सबसे बड़ी बात होती किसी के लिए भी अब जरा सोचिये जिस कॉमनवेल्थ के नाम पर 70000 करोड़ रुपये खर्च किये गए उनमे 7 लाख खिलाडी पैदा किये जा सकते थे जिनमे से सभी अगर पदक ना भी ला पाते तो भी पदक तालिका में सर्वोच्च स्थान हमारा हीं होता और अगर कुछ भी न होता तो कम से कम हम देश को 7 लाख अच्छे नागरिक तो देते

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

अपराधी

दुनिया भर के सभी अपराधियों को हम ३ वर्ग में बाँट सकते हैं
१) वो जो बगैर किसी डर और शर्म के अपराध करते हैं ये बेहद खतरनाक हैं और इन्हें इनकी अंजाम तक पहुचना हीं पुलिस का प्रथम कर्त्तव्य है
२) ये वो लोग हैं जो अपराध करते तो हैं पर पकडे जाने के डर के साथ इनके डर को इतना बढ़ाना होगा कि ये हिम्मत ही न कर सकें
३) तीसरे वर्ग शोषित वर्ग है जो अपराध करते तो हैं पर मुख्यत पहले प्रकार के अपराधी के भय से इन्हें भयमुक्त करना किसी भी पुलिस का दायित्व है

अपराधी

अयोध्या विवाद

यह लेख मैं अयोध्या विवाद का फैसला आने के बाद लिख रहा हूँ हमारे देश कि मिडिया इस मामले को इतना तुल नहीं दी होती तो शायद इसे इतना बड़ा विवाद के रूप पे भी न देखते हमारे देश में इतने मस्जिद हैं पर वहां जाकर इबादत करने वाले कितने है जो एक मस्जिद कम होने से अल्लाह की इबादत पर असर पड़ेगा या देश के हिन्दू अपने जन्मभूमि में अपना घर तो ठीक से बना ले तो फिर सोचे मंदिर बनाने के लिए "भगवान कण-कण में बसते है" क्या यह बात हिन्दुओं ने भुला दिया है? फिर वो या तो हरेक कण को अपने नाम बना लें यह उस विवाद पूर्ण भूभाग पर यथा स्थिति बने रहने दें कम से कम किसी की जान तो नहीं जाएगी हमें आदत हो गयी हैं अपने आदर्शों को मूर्त रूप दे कर उनकी पूजा करने का, हम उन पद-चिन्हों पर नहीं चलना चाहते बस सुबह जगे, नहाया धोया और बैठ गए पूजा करने फिर चाहे दिन भर अपने कर्मो से प्राणियों को क्यों न सताता फिरें भगवान राम थे यह बात हर-एक हिन्दू मानता है उन्होंने जटायु के साथ जो प्रेम दिखलाया क्या वो किसी से छुपा है? फिर हम, खुद को उनका भक्त मानते हुए भी मुसलमानों के प्रति दुराभाव क्यों रकहते हैं अगर कोई इस संबंद में यह कहे की मुसलमानों ने ये किया, उन्होंने वो किया तो मैं उस संत का उदाहरण देना चाहूँगा जिन्होंने बिच्छु का डंक सक कर भी उसे अपने हाथ से निचे यह कहते हुए नहीं उतारा कि जब यह अपनीआदत नहीं छोड़ रहा है तो मैं अपना कर्त्तव्य कैसे छोड़ दूँ

सोमवार, 20 सितंबर 2010

भारत की वर्त्तमान स्थिति के लिए सर्वाधिक जिम्मेदार कौन?

"भारत एक महान देश है" यह सिर्फ एक सुवाक्य मात्र नहीं है यह है वो जज्बात जो प्रत्येक भारतवासी के दिल में पाया जाता है भारत को महान सिर्फ भावनात्मक हो कर नहीं बताया या कहा जाता है बल्कि इस कथन के समर्थन में कई सरे तथ्य प्रस्तुत किये जा सकते है और यह पुर्णतः हमारे शीर्षक से अलग की विषयवस्तु है जिसपर हम फिर कभी चर्चा करेंगे अभी हम वर्तमान शीर्षक पर लौटते हैं--
भारत वर्ष की पूर्ण जिम्मेदारी यहाँ के नागरिको की है, पर सरकार यहाँ के नागरिक नहीं चलातेपरोक्ष रूप पे सत्ता जनता के नुमायिन्दोंके हाथों में है जो खुद को जनता के प्रतिनिधि बताया करते हैंपरन्तु जनताखुद इनके बर्ताव से आश्चर्यचकित होती है की क्या सच में ये वही लोग है जिसको उसने चुना था, अपनी बेहतरी के लिए , सुशासन के किये, अपने देश की विकास करने के लिए !!!
वास्तव में देश की गर्त में पहुचने के लिए नेता जिम्मेदार है देश की जनता क्योंकि जनता चाहे लाख ना नुकुर कर ले पर वास्तविकता तो यही है की उसी ने उन नेताओं को वो पदवी दी है जिस पर बैठ कर वो मनमाने तौर पर कार्य कर रहे हैं पर देश के नागरिको को कैसे दोष दिया जाये कही पर भी इतनी बड़ी आबादी गलत नहीं हो सकती यह बिलकुल भी विश्वास के लायक बात नहीं है के भारत के सरे लोग मतिहीन हैं तभी तो ये नालायक लोग उतने महत्वपूर्ण पदों पर बैठें हैं पर इस बात से कतई मुंह नहीं मोड़ा जा सकता की, "वास्तविकता तो यही है" तो आखिर गलती कहाँ पर हुई? सारी जनता भी गलत नहीं है तो ये कैसे पहुँच गये उस स्थान तक?
मेरा मानना है के दोष सरकार और जनता के बिच की कड़ी का है और वो कड़ी है " भारत का चुनाव आयोग" देश की २/३ जनसँख्या साक्षर है अगर हम इनमे से सभी को शिक्षित ना भी समझे तो भी इनमे से आधे लोग सही गलत का समझ रखते ही होंगे, यह तो मान सकते हैं अगर ३५ % जनसँख्या भी विवेकानुसार वोट डालती है तो हमेशा एक बेहतर उम्मीदवार जनता का प्रतिनिधि बनेगा आज स्थिति यह है कीअगर किसी स्थान पर ५५-६०% भी मतदान हुआ तो उसे बहुत अच्छा माना जाता है आखिर यह मानसिकता क्यों है आयोग की? ऐसा लगता है की जो ४०-४५% लोग मतदान में भाग नहीं लिए वो समझदार तो नहीं पर सही गलत क विवेक जरूर रखते होंगे
मेरा उपरोक्त कथन एक विवाद का विषय हो सकता है पर अगर हम सूक्ष्म दृष्टि से देखे तो ये तथाकथित समझदार लोग ही है जो एक सही नेतृत्व प्रदान कर सकते हैं या कम से कम एक सही नेता तो चुन ही सकते हैं पर वो ऐसा नहीं करते वो निश्चित तौर पर गलत करते हैं परइसके लिए वो जो कारन देते हैं वो भी गलत नहीं लगता मुख्य रूप में ये कारन होते हैं---
मतदान के लिए लगने वाली कतार : चुनाव आयोग अगर चाहे तो चुनाव के लिए और ज्यादा समय दे सकता है या चुनाव कर्मी घर घर जाकर मतपत्र पेटी (Ballot box ) में मतदान करवा सकते थे हो सकता है की यह काफी असुविधाजनक और महंगा होता पर एक बुरे नेता की तुलना में यह अच्छा ही होता हम ऐसा भी कर सकते है की मतदान अनिवार्य कर दें और पहले अवस्था में शिविर में मतदान कराये और जो शिविर में ना आ पायें उनके लिए मतदान कर्मी घर जा कर मतदान करवाएं पर घर पर मतदान करवाने वालों की भीड़ को कम करने के लिए चाहे तो कुछ जुरमाना भी लगा सकते हैं।

सही उम्मीदवार का होना: ऐसा बहुत बार देखा गया है की जनता में मतदान के प्रति अनिच्छा सही उम्मीदवार का मैदान में ना होना भी होता है इसके निवारण हेतु मतपत्र पेटी एक बटन सभी उम्मीदवारों को अस्वीकार करदेने का भी होना चाहिए और अगर चाहें तो दूसरा बटन राष्ट्रपति शासन या डीएम /मतदान मतदानशासन स्वीकार करने का भीक्योंकि यह पाया गया है की देश की जनता में राजनीतिज्ञों की ख़राब छवि की वजह से राष्ट्रपतिशासन के प्रति लगाव की भावना आ जाती है
मतदान कर्मियों के मतदान को और आसन बनाना: चुनाव आयोग अगर चाहे तो यह सर्वेक्षण करवा कर ज्ञात कर सकती है कि कितने प्रतिशत सरकारी कर्मचारी मत दे पाते हैं वो अपने चुनाव में कार्यरत होने कीवजह से अपने वोते का इस्तेमाल नहीं कर पाते